Showing posts with label hindi story.. Show all posts
Showing posts with label hindi story.. Show all posts

Friday, 28 August 2020

King Manik Chandra's generosity

 राजा माणिक चंद्र की उदारता

बंगाल में गुसकरा एक छोटा सा स्टेशन है। एक दिन रेलगाड़ी आकर स्टेशन पर खड़ी हुई। उतरने वाले झटपट उतरने लगे और चढ़ने वाले दौड़-दौड़ कर गाड़ी में चढ़ने लगे। एक बुढ़िया भी गाड़ी से उतरी। उसने अपनी गठरी खिसका कर डिब्बे के दरवाजे पर तो कर ली थी; किन्तु बहुत चेष्टा करके भी उतार नहीं पाई थी। कई लोग गठरी को लांघते हुए डिब्बे में चढ़े और डिब्बे से उतरे। बुढ़िया ने कई लोगों से बड़ी दीनता से प्रार्थना की कि उसकी गठरी उसके सिर पर उठा कर रख दे ; किंतु किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। लोग ऐसे चले जाते थे, मानो बहरे हो। गाड़ी छूटने का समय हो गया।बेचारी बुढ़िया इधर-उधर बड़ी व्याकुलता से देखने लगी। उसकी आंखों से टप-टप आंसू गिरने लगे।

  एकाएक प्रथम श्रेणी के डिब्बे में बैठे एक सज्जन की दृष्टि बुढ़िया पर पड़ी। गाड़ी छूटने की घंटी बज चुकी थी; किन्तु  उन्होंने इसकी परवाह नहीं कि। अपने डिब्बे से वह शीघ्रता से उतरे और बुढ़िया की गठरी उठाकर उन्होंने उसके सिर पर रख दी। वहां से बड़ी शीघ्रता से अपने डिब्बे में जाकर जैसे ही वह बैठे, गाड़ी चल पड़ी। बढ़िया सिर पर गठरी गठरी लिए उन्हें आशीर्वाद दे रही थी- 'बेटा ! भगवान तेरा भला करे।'

  आप जानते हो की बुढ़िया की गठरी उठा देने वाले सज्जन कौन थे? वे थे कासिम बाजार के राजा  माणिक चंद्र नन्दी , जो उस गाड़ी से कोलकाता जा रहे थे। सचमुच वे राजा थे, क्योंकि सच्चा राजा वह नहीं है जो धनी है या बड़ी सेना रखता है। सच्चा राजा वह है, जिसका हृदय उदार है, जो दीन दु:खियों और दुर्बलो की सहायता कर सकता है? ऐसे सच्चे राजा बनने का तुम में से सबको अधिकार है। तुम्हें इसके लिए प्रयत्न करना चाहिए।

Saturday, 15 August 2020

Hindi Story-चिकना घड़ा

 चिकना घड़ा

एक सेठ था।उसका घी-तेल का व्यापार था। शुद्ध माल बेचता था, इसलिए उसकी दुकान पर खूब बिक्री होती थी। अच्छी बिक्री के कारण उसके पास कुछ धन जमा हो गया था। 

उसके घर में केवल दो ही प्राणी थे- वह और उसकी पत्नी। उसके कोई संतान नहीं थी। जब बुढ़ापा समीप आने लगा तो वह व्यापार के साथ-साथ तीर्थ भ्रमण, पूजा-पाठ व सामाजिक कार्यों में भी रुचि लेने लगा।

 एक बार उस सेठ के नगर में कवि- सम्मेलन का आयोजन हुआ तो सम्मेलन में भाग लेने के लिए दूर-दूर से कई प्रसिद्ध कवियों का आगमन हुआ।

सेठ ने अपने जीवन में कोई कवि- सम्मेलन ना देखा था। अतः रात को वह अपने दुकान को बंद करके वह भी कवि सम्मेलन देखने चला गया।

 सबसे प्रथम एक कवि ने सरस्वती वंदना का मनोहर चंद सुनाया और फिर भक्ति- रस की कुछ अन्य कविताएं सुनआई। सभी वाह-वाह कर उठे। सेठ के मन में भगवान की भक्ति की तरंगें उठने लगी।

 

दूसरे नंबर पर एक कवि ने देशभक्त के जोशीले गीत सुनाए। उनकी सभी रचनाओं को भी सब श्रोताओं ने खूब सराहआ।

फिर,तीसरे नंबर पर जब एक हास्य- कवि की बारी आई तो, बस जैसे सम्मेलन में हंसी का तूफान उठ खड़ा हुआ। कविवर हाथ फेंक कर और तरह-तरह की मुद्राएं बदल-बदल कर कविता- पाठ कर रहे थे और सुनने वाले हंसी के मारे लोटपोट हुए जा रहे थे। हंसी के मारे सेठ के पेट में भी बल पड़ गया। लोग वाह-वाह कर उठे।

 जब हंसी का दौर कुछ थमा तो बारी आई- वीर- रस के कवि महोदय की। कवि का उपनाम "बंम्ब " था।

 उपनाम के अनुरूप ही, मानव" बम" फट पड़ा था। कविता क्या थी, सिंह- गर्जना थी! कुछ क्षणों के पूर्व वाला हंसी का सारा हल्का-फुल्का वातावरण कविता की दो पंक्तियां सुनते ही ओजस्वी हो उठा। अन्य बलवान श्रोताओं की बात तो अलग थी, मरियल- से सेट की भी बोटी-बोटी फड़कने लगी और मुख पर तेज झलकने लगा।

 सेठ ने अपने समीप बैठे एक व्यक्ति से पूछा-' भैया यह कवि लोग कहां पाए जाते हैं?'

 

सेठ की बात सुनकर वह व्यक्ति हंसकर बोला-' सेठ जी' कवि संसार के सभी देशों, नगरो, गांव, मोहल्ला, जाति, धर्म- संप्रदाय में पाया जाने वाला जंतु है। शब्दों का जोड़- तोड़ भिड़ा कर कुछ अंट-सन्ट सेट गढ़ लो- बन गए कवि! चाहो तो तुम भी कवि बन सकते हो?'

 सेठ मन- ही- मन अपने जीवन से कवियों के जीवन की तुलना करने लगा- वह भी तो अपने दुकान में दिनभर शुद्ध घी और तेल बेचता है, कभी किसी तेल या घी खरीदने वाले खरीददार ने उसके काम की सराहना नहीं की। उसे समाज की ओर से भी कभी वाहवाही नहीं मिली। सचमुच उससे तो कविओ का जीवन ही अच्छा है। बस, एक-दो चंद बनाकर सुना दो और खूब यश व धन लूटो।

 फिर अपनी ढलती जवानी का ध्यान आया तो सोचने लगा- अब तो थोड़ा सा जीवन और बचा है, वह भी घी- तेल बेच कर ही कट जाएगा। कवियों का श्रेष्ठ जीवन उन्हें ही मुबारक!

 किंतु यह विचार भी स्थाई ना रह सका। उसे किसी नीतिकार का वचन याद आया- किसी शुभ काम की प्रेरणा मिलने पर प्रमाद न करते हुए उस काम को कर ही डालना चाहिए।

 इसी उहापोह में वह उठकर चल दिया। पूरे मार्ग में वह यही बात सोचता रहा कि वह क्रांतिकारी विचार के अनुसार अपने जीवन को बदलने का प्रयत्न करें या नहीं?

 अपने घर पहुंचते-पहुंचते सेठ के क्रांतिकारी विचार की विजय हो गई। उसने अपने मन में दृढ़ संकल्प कर लिया कि वह अब कभी बने बिना चैन से ना बैठेगा।

रात को उसे सपने में भी कवि- सम्मेलन के दृश्य ही दिखाई देते रहे। एक सपना तो उसने यह भी देखा है कि वह कविता- पाठ कर रहा है। लोग 'वाह-वाह!' और 'धन्य- धन्य' कह रहे हैं और, कविता- पाठ करके जब वह अपने घर लौटा है तो गुलाब के फूलों का बड़ा सा हार उसके गले में झूल रहा है। पारिश्रमिक या पुरस्कार के रूप में प्राप्त पांच-सौ-एक रुपये उसकी जेब में पड़े हैं, सो अलग।

 उस समय प्रसन्नता में डूबा वह गले के हार को उतारने लगता है तो एकाएक उसके नींद टूट जाती है- जो गमछा गले में अटक गया था, उसी हार को, वह अपने गले से हटाता है।

 दूसरा दिन

 दूसरे दिन वह सेठ जल्दी-जल्दी दैनिक कार्यों से निपट कर कवि सम्मेलन के आयोजक के पास जा पहुंचा और बोला-' मुझे किसी अच्छे से कवि का पता बता दीजिए।

 'आप भी कोई कवि- सम्मेलन करना चाहते हैं क्या? आयोजक ने पूछा।

' नहीं, मैं तो स्वयं कवि बनना चाहता हूं।' सेठ ने कहा।

  सेठ का यह उत्तर सुनकर वह व्यक्ति मन- ही- मन हंसा किंतु उसने सेठ को छकाने के लिए एक धूर्त और अहंकारी तथाकथित कवि का पता बता दिया।

 सेठ पर तो कवि बनने का भूत पूरी तरह सवार था ही, वह तुरंत ही कविराज के दर्शनों को चल पड़ा।

 सेठ ने कभी के पास पहुंच कर उसके चरण स्पर्श किए और उसके बाद अपने आने का उद्देश्य बताया

सेठ का उद्देश्य जानकर कवि महोदय मुस्कुरा कर बोले-' विचार तो आपका उत्तम है किंतु..........'

 'किंतु क्या?' सेठ ने व्यग्रता के साथ पूछा।

' कवि बन पाना इतना आसान नहीं है, जितना आप समझ रहे हो। इस विद्दा को सीखने के लिए बड़े-बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं। तब कहीं जाकर……'

कवी अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि सेठ बोल पड़ा-' आप चिंता ना करें गुरुवर! पापड़, पूरी, यहां तक कि आप की रोटी तक बेलने के लिए तैयार हूं। आप किसी तरह मुझे कवि बना दीजिए। मेरे जीवन की अंतिम साधना पूरी हो जाएगी।

'हूँ........,ऐसा ज्ञात होता है कि आप दृढ़ निश्चय करके घर से चले हैं? कवि ने पूछा।

 'आपका विचार सोलह- आने सच है।'

'हूँ.....'लंबा हुंकार मारने के बाद कवि महोदय ने अपने मन में सोचा- हास्य में चल सकता है। फिर सेठ से पूछा-' आपकी रूचि किस रस में है?'

 सेठ ने समझा, शायद कवि उसके सत्कार के लिए किसी रस की बात पूछ रहे हैं। अतः वह सकुचाकर बोला-' ह... ह.... ह.... रस की क्या जरूरत है। वैसे संतरा, मोसम्मी या जो भी आप व्यवस्था कर सके, वही रस ठीक रहेगा।'

  सेठ की यह बात सुनकर कवि ने उसे मन- ही- मन उसे भद्दी- सी गाली दी, किंतु प्रकट में हिना- हिनाकर बोला- ह....ह... ह..... मेरा मतलब साहित्य रस से है। आप किस रस में साहित्य सर्जन करना चाहते हैं?'

 सेठ को साहित्यिक- रसों की जानकारी भला कहां थी। वह मुंह- बाये कवि को देखता रहा, तो कवि समझ गया कि सेठ निरा काठ का उल्लू है। वह बोला-' काव्य के नौ रस होते हैं। हर कवि को अपनी आकृति और स्वभाव के अनुरूप उनमें से एक रस चुनना होता है। उसी रस की साधना करनी होती है तथा उसी रस के कवि के रूप में ही वह जाना जाता है।'

  'मैं आपके सामने खड़ा हूं। आप जो भी रस मेरे लिए उचित समझे, बता दे। हां, आपसे यह बात मैं डंके की चोट पर कहता हूं कि रस में विष कदापि नहीं मिलाऊंगा। मेरी शुद्ध देसी घी की दुकान है, परंतु मैंने कभी मिलावट नहीं की। अब आप ही बताइए- फिर साहित्य के रस में ही मिलावट क्यों करूंगा?' सेठ बोला-

  'आपके उत्तम विचार जानकर हम प्रसन्न हैं- भद्र! आपकी शुद्ध घी की दुकान है, तो अगली बार जब पधारे तो किलो दो- किलो…..'

  'दो किलो क्यों, गुरुवर! पूरा कनस्तर लाऊंगा। गुरु- सेवा से बढ़कर और कौन- सा पवित्र कार्य हो सकता है? सेठ ने हाथ जोड़कर कवि की बात काटकर बीच में ही कहा।

 कवि मन- ही- मन मुस्कुराया। फिर बोला-' ठीक है यह आपकी कोमल काया को देखते हुए मैं आपकी काव्य- साधना के लिए शृंगार-रस उचित समझता हूं।

 'शृंगार और पुरुष के लिए!' सेठ चौका। बोला- गुरूजी श्रृंगार- रस तो महिला कवि…

 'आप ठीक समझें। बुद्धि- कुशाग्र है, विद्दा को जल्दी ग्रहण करोगे।' कविवर  नहीं प्रसन्नता व्यक्त की।

' आपकी कृपा से गुरुवर!' श्रद्धा से मस्तक नवाया ने।

  'हां तो, अब मैं आपसे कुछ प्रश्न पूछूंगा और कवि बनने के लिए जो स्थूल- साधना आवश्यक है, वह बताऊंगा' कवि बोला।

 'गुरुवर! साधना की बाद तो समझ में आती है, किंतु यह स्थूल क्या बला है?

 'स्थूल- साधना से अभिप्राय कवि बनने की ऊपरी तैयारी से है, जब आप ऊपरी तैयारी कर चुकोगे तो सूक्ष्म- साधना के अधिकारी अपने आप बन जाओगे।' कवि ने बताया।

 सेठ के पल्ले कवि की बात बिल्कुल ना पड़ी। किंतु उसकी नाराजगी के डर से उसने पूछा भी कुछ नहीं। हां, हाथ जोड़ते हुए यो बोला-' आप जो भी प्रश्न पूछना चाहे- पूछ ले, मैं तैयार हूं।

 आसन पर जमकर बैठते हुए बोला-' आपका प्रिय व्यसन कौन सा है?'

 'मैं व्यसनों से कोसों दूर हूं।' सेठ ने उत्तर दिया।

 'मेरा मतलब है- धूम्रपान में सिगरेट, बीड़ी या चिल्लम?'

 'कोई भी नहीं। सेठ बोला।

 'तो सिगरेट से प्रारंभ करके सिगार की तरफ बढ़ना होगा। और हां, पेय में मदिरा प्रिय है या भांग? यदि मदिरा-पान कर लेते हो तो कौन- सा ब्राण्ड? कवि ने पूछा।

 'आप कैसी बातें कर रहे हैं, प्रभु! मैं तो इनमे से किसी भी वस्तु को छूना भी पाप समझता हूं।' सेठ ने कहा।

 'ह.....ह......ह......तो आपको कवि नहीं, भक्त बनने का प्रयास करना चाहिए अरे पगले! कवि और वह भी श्रृंगार- रस का! यदि आपके मस्तिष्क में ही मादकता ना रहेगी तो फिर कविता में क्या खाक मादकता का संचार कर पाओगे। खैर! हताश होने की जरूरत नहीं, आप केवल उक्त वस्तुओं का प्रबंध करके ले आवे। अभ्यास कराना मेरा काम है। हां, एक प्रश्न और।'

 'पूछिये गुरुवर!'

 'आपका इष्ट-देव कौन है?'

 'भगवान श्री कृष्ण।'

 हां, तुम्हारा ईष्ट देव श्रेष्ठ है, चलेगा। किंतु इसके साथ ही आपको अपनी पत्नी को भी अपने इष्ट देवी समझना होगा।आप अब उसे सुमुखे, सुनयने, प्रेरणा आदि संबोधनों से संबोधित करेंगे- 'लल्लू की महतारी' या 'पप्पू की मम्मी' कह कर नहीं।'

 'अजी महाराज! घर में कोई लल्लू या पप्पू ही होता तो कवि बनने की सनक ही मुझ पर क्यों सवार होती?'

 'तो आप नि:संतान हैं?'

 'हां भगवान! दीर्घ श्वांस खींचकर सेठ बोला।

 'यह शुभ लक्षण है। भगवान ने आपको कवि बनने के लिए ही तो इस धरा-धाम पर भेजा है।'

 'और कोई हिदायत? पूछा सेठ ने।

 'हिदायत नहीं, सफलता के सूत्र कहो- मेरे इन उपदेशों को। भविष्य में यही उपदेश तुम्हें' महान कवि' की उपाधि से विभूषित करायँगे।

 'आपकी कृपा के लिए आभारी हूं गुरुवर!'

 'अरे हां! कुछ याद करता हुआ कवि बोला-' अभी दो बातें बताना तो मैं भूल ही गया।'

 'तो अब बता दीजिए, गुरुजी।'

 'हां आपको अपनी वेशभूषा में भी पूरी तरह परिवर्तन करना होगा।' सेठ चौका।

 'धीरे-धीरे सब समझ समझ जाओगे वत्स। यह गुण विद्दा है, आसानी से समझ में कहां आ जाती है। मन- ही- मन यो बड़बडाकर कवि बोला-' इस लालशाही पोशाक को छोड़कर कुर्ता और पैजामा अपनाना होगा। केशो को बढ़ाना होगा और कंधे पर पद यात्रियों वाला थैला भी आवश्यक है।'

  कुछ सोचता हुआ सेठ बोला-' गुरूजी, और सब परिवर्तन तो मैं कर लूंगा, किंतु....'

  'गुरु- वचनों में किन्तु-परन्तु की गुंजाइश कहां, उनको तो आंखें मूंदकर पालन करना आवश्यक है।' कविवर ने कहा।

  'यह बाल बढ़ाने का झंझट मुझसे ना पाला जाएगा, स्नान करने पर यह घंटों सूखने का नाम ही नहीं लेंगे। काव्य- रचना  की बजाय मै बालों का ही गुलाम बन कर रह जाऊंगा।' सेठ बोल।

 'अरे- मेरे बहुत प्यारे शिष्य! आप श्रृंगार रस के कवि बनने जा रहे हो, घसियारे नहीं। फिर आप से नहाने के लिए किस उल्लू ने कहा है। नहाओ भले ही साल में एक बार, किन्तु बालों को तेल-कंघी का पोषण मिलते रहना आवश्यक है।'

 'तेल तो एकदम शुद्ध, पीली सरसों का मेरे यहां मौजूद है ही को उसकी कोई चिंता नहीं- चिंता है तो केवल बालों के सवारने की।'

 'आप फिर चूक गए सेठ! भई एकदम शुद्ध की बजाय भले ही महा-अशुद्ध हो, किन्तु तेल सुगन्धित होना चाहिए। चमेली, मोगरा या आंवला कोई भी सुगंध ठीक रहेगी।'

 'मैं धन्य हुआ गुरुजी!' यह कहकर सेठ ने विदाई ली।

 तीसरा दिन

  सेठ जी ने अपने घर पहुंच कर जब पत्नी को अपनी खुराफात सुनाई तो उसने अपना मस्तक पीटते हुए सेठजी को समझाया-' कवि सम्मेलनों में कवियों का काव्य- पाठ सुनने गए थे या कवि बनने? यदि कल को किसी सर्कस में खेल देखने चले गए तो तुम झूलों पर कलाबाजी भी खाने लगोगे? नहा-धोकर भगवान का नाम लो और अपने दुकान पर पहुंचो, बन लिए कवि........ हूँ ।

 सेठजी के मन में तो यह आया कि अपनी पत्नी की बात के उत्तर में कह दे कि स्त्री की बुद्धि हमेशा उसकी छोटी में बंधी रहती है, किंतु प्रकट में बोले-' प्रिये! सुमुखे ! सुनयने !!! तुम्हारे बल पर ही तो मैं काव्य- जगत में प्रवेश करने वाला हूं.....  और तुम हो कि...... '

 सेठजी शायद आगे भी कुछ कहते, किंतु तभी सेठानी हाथ नचाते हुए बोली-' हाय राम, और लो ! कवी तो ना जाने कब बनोगे, ये ढोंग- भरे चोंचले अभी से शुरू कर दिए।'

 'तुम कुछ भी कहो अब तो कवि बन कर ही यश और सम्मान कमाना है।'

  सेठानी चतुर् थी। अपने पति के स्वभाव से वह अच्छी तरह परिचित थी- समझ गई कि ये तो चिकने घड़े हैं, जब तक इन्हें भरपूर टक्कर न लगेगी, इन्हें अक्ल न आएगी। समझाना- बुझाना बेकार है। बोली-' मैं तो आपकी अनुगामिनी हूं, प्राणनाथ! जिस काम में आपकी रूचि हो, वही करो।

 सेठ को सपने में भी विश्वास ना था कि उसकी पत्नी इतनी आसानी से स्वीकृति दे देगी। वह प्रसन्न हो उठा।

 दूसरे दिन ही अपने सेवक के हाथों उसने शुद्ध घी का एक कनस्तर और कुछ नगद रुपए अपने गुरु के यहां भेज दिए और स्वयं अपने गुरु के उपदेश का पालन करने में जुट गया।

 गुरुजी की अन्य आज्ञाओ का पालन करने में तो कोई विशेष कठिनाई नहीं हुई, किंतु काफी प्रयत्न करने पर भी वह मदिरा-पान ना कर सका। हां, मदिरा के स्थान पर उसने दिन भर चाय सुड़कना शुरू कर दिया।

  उसकी पत्नी उसके लक्षणों को देख- देख कर परेशान थी, किंतु बेचारी मूकदर्शक बनी हुई थी। कहां तो पहले सेठ जी प्रातः तड़के बिस्तर छोड़ कर स्नान- ध्यान आदि दैनिक कार्यों में लग जाते थे और कहां अब 8:00 बजे तक भी बिस्तर पर में पड़े-पड़े करवट बदलते हुए उसे गुहार लगाते-' भद्रे, एक कप गर्म- गर्म चाय दे दो,ताकि तुम्हारा होनहार कवि- पति, उसे हथियार बनाकर, तन्द्रा से संग्राम कर सके।'

  'हे राम ! इनकी बुद्धि को क्या हो गया है? अनियमित और सड़ीयल जीवन जीने से आखिर कवि का क्या संबंध है?' वह मन ही मन बुदबुदाती और प्रत्यक्ष में उसे चाय बनाकर देनी ही पड़ती।

 दो महीने की साधना के बाद सेठ के लिए में बदलाव आने लगा। दुकान पर ग्राहक भी उससे उपहास करने लगे। उससे सेठ यह तो समझ गया कि वह उन्नति की ओर बढ़ रहा है, किंतु फिर भी गुरु से पूछना आवश्यक था। अतः एक दिन वह गुरु जी से मिलने चल दिया।

 चौथा दिन

  गुरुजी ने जैसे ही उसे देखा- वह खुशी से उछलते हुए बोले-' वाह..... वाह..... वाह......वाह मेरे प्यारे,वाह -वाह ! आपने तो कमाल ही कर दिया। परिवर्तन ! सचमुच परिवर्तन !! आश्चर्यजनक परिवर्तन !!!'

 'आपके आशीर्वाद का ही फल है, गुरुजी सेठ ने श्रद्धा सहित गुरु के चरण स्पर्श किए।

  'हां प्रिय आपके हुलिये को देखकर यह बात डंके की चोट पर कही जा सकती है कि आपका हुलिया फिफ्टी पर्सेन्ट कवि  का हुलिया.... किन्तु  व्यसनों....'

 गुरु की बात को बीच में ही काट कर सेठ  बोला-' प्रभु ! सिगरेट का अभ्यास तो धीरे-धीरे कर रहा हूं, किन्तु मदिरा का सेवन मुझसे ना हो सकेगा। हां, मदिरा के स्थान पर चाय खूब पीने लगा हूं।

 'बहुत अच्छा ! बहुत अच्छा !! यह शुभ लक्षण है। रही बात मदिरा की, तो उसका लाभ गुरु अर्पित करने पर मिल सकता है। मैं तुम्हें फलदायक ब्रांड का नाम लिख दूंगा। मेरे लिए एक महीने का कोटा (लगभग 20 बोतल) एक साथ ही भेज देना।'

 'जो आज्ञा गुरुवर ! अब आप मुझे कविता बनाने का ढंग बताने की कृपा करें।'

  'आपके ऊपर हम शत- प्रतिशत यानी हण्ड्रेड परसेंट प्रसन्न है सेठजी, अवश्य कृपा करेंगे !' सेठ से यह कहकर कवि जी आंख मूंदकर कुछ सोचने लगे। दस-पंद्रह मिनट बाद आंख खोली और चारों ओर देखकर, पेड़ पर बैठे एक बंदर पर नजर गड़ा करा कर बोले-' वह पेड़ पर कौन बैठा है?'

  शिष्य ने गौर से देख कर बताया-' बंदर है, गुरुजी !

  'ठीक पहचाना ह.....ह......ह......अब बंदर पर कविता बनाता हूं, सुनो !'

  'सुनाओ !'

  'हम हैं घर के अंदर !

 ' हम पर है बंदर !!

  गुरुजी ने छंद बनाया। शिष्य ने सुना तो वह खुशी से झूम उठा- वाह ! गुरुवर ! आपको तो सचमुच् सरस्वती सिद्ध है।'

  'बस, इसे गुरु मंत्र मांन कर शाम को नित्य दो घंटे जपना शुरू कर दो। इससे आपकी बुद्धि कुशाग्र हो जायगी।

   'शाम को तो दुकान पर बैठना होता है।' शिष्य ने अपनी परेशानी प्रकट की।

   'भाई ! महान कवि बनने के लिए प्रयत्नशील व्यक्ति को दुकान का झंझट शोभा नहीं देता। आपको दुकान का काम छोड़ना होगा।

 'यही काम करूंगा गुरुवर !' यो कह कर सेठ गुरुजी की बनाई हुई कविता को रटने लगा।

  'आप इस कविता का अच्छी तरह अभ्यास कर लो, आज रात तो मैं आपने साथ आपको कवि- सम्मेलन में ले चलूंगा।गुरुजी ने अपने शिष्य से कहा-' हां, एक बात याद रखना कि कविता- पाठ करते समय आपकी आंखें बिल्कुल मुदि होनी चाहिए।'

 'ऐसा क्यों गुरु जी? शिष्य ने पूछा।

 'प्रारंभ में आंख मूंदकर ही काव्य- पाठ करना अच्छा रहता है। इससे एकाग्रता बनी रहती है।' गुरु ने समझाया।

 शिष्य प्रसन्न हो गया और रचना को बोलने का अभ्यास करने लगा।

  रात को सेठ जब गुरु के साथ चलने लगा तो उसका मन प्रसन्नता के मारे बिल्लियो ऊंचा उछल चल रहा था।

  इतनी जल्दी किसी कवि- सम्मेलन में कविता सुनाने का अवसर मिल सकता है, इस बात की उसने सपने में भी आशा ना थी। वह पूरे रास्ते अपनी कविता को ही रटता रहा।

 बड़े उल्लास पूर्ण वातावरण में कवि- सम्मेलन शुरू हुआ। सेठजी ने जी भर कर आनंद लिया। जब सब कवि अपनी रंचना  सुना चुके तो संयोजक से प्रार्थना करके गुरुजी ने सेठ का नाम बुलवा दिया।

  बस, फिर क्या था। सेठ माइक के सामने जा पहुंचा। माइक को बाएं हाथ से थामकर जैसे ही उसने भीड़-भाड़ को देखा, उसके होश गुम हो गए। कविता के स्थान पर आंखें बंद करके वह ऊंचे स्वर से बंदर... बंदर.... ही करता रहा।

 उसके बेसुरे आलाप को सुनकर सब श्रोता एवं कवि हंसते हुए चले गये। हां, उसके गुरुवर मुस्कुराते हुए मंच के पीछे अवश्य बैठे रहे।

  लगभग आधा घंटा बाद जब सेठ ने आंखें खोली, तो केवल एक व्यक्ति एक व्यक्ति बोल उठा-' मैंने अपड़ो सामियाने उतरवानी छै। थे अपनी वाणी कु लगाम लगाओ, कवि जी !'

  कवि महोदय तो वाहवाही की आशा में रेक रहे थे। जब उन्होंने अपने सामने बैठे एकमात्र पगड़ीधारी मारवाड़ी की यह बात सुनी तो अपने पीछे गुरुजी से वह बोला' गुरुजी यह क्या हुआ? मुझे हार और पुरस्कार….'

फूलों का हार तो कुंहला जाता वत्स, यह करारी हार आपको आजन्म याद रहेगी। कवि ही नहीं, आप तो अनोखे कवि रहे।घर जाओ और अपना डिटेल घी -तेल बेचो !' गुरुजी ने मुस्कुराते हुए कहा।

 सेठजी तो चिकने घी- तेल का व्यापार करते-करते स्वयं भी चिकने घड़े बन चुके थे। वह पुनः अपने पुराने धंधे से लग गये।

Sunday, 9 August 2020

Hindi story-बड़ा कौन?

 बड़ा कौन

एक बार उड़द की दाल और बड़ों में झगड़ा हुआ। दाल कहती थी कि मैं बड़ी और बड़े कहते थे कि हम बड़े। यह विवाद हो ही रहा था कि इतने में बड़ों ने दाल से प्रश्न किया कि तुम कैसे बड़ी हो और तुम्हारे पास बड़े होने का क्या प्रमाण है? यह सुन दाल बोली कि मेरे पास तुम्हारे लिए सिर्फ यह सबूत है कि तुम मुझसे पैदा हुए हो और मैं ना होती,तो तुम कहां से आते, तब बड़ों ने कहा कि यह ठीक है। पर तुम भी यह बताओ कि यदि ऐसा है तो तुम्हारा नाम लोगों ने दाल क्यों रखा? बड़ा क्यों ना रखा और तुम को बड़ा क्यों नहीं कहा। हम तुमसे ही हे उड़द, बड़े बोले।
 
पर सुनो-" यह बात यह नहीं, बल्कि बात यह है कि तुमने तो सिर्फ एक दुख सहा, यानी दलि गई इसलिए दाल हुई और हमारी कथा सुनो की प्रथम लोगों ने हमको दाल की अवस्था से लेकर पानी में गलाया। हमारी खाल खींची पर इस पर भी उनको तृप्ति नहीं हुई। तब उसी उस धुली दाल को लेकर सिलबट्टे पर खूब ही पिसा, परंतु इस पर भी उनका दिल ना भरा। तब उसमें नमक भरा, इतने पर भी हमारा पीछा ना छोड़ा।मार-मार थप्पड़ो से पोया। इस पर भी उन्हें सब्र ना हुआ। पुनः चूल्हे पर कड़ाही रख तेल को खूब गर्म किया और उस गरम कड़ाही में मुझे छोड़ दिया। इतनी तकलीफ सहने के बाद मैं बड़ा बना हूं और तुम लोगों ने मुझे बड़ा कहा।

 


इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है जो पुरुष धर्म के लिए या परोपकार के लिए तकलीफ उठाता है, वही बड़ा बनता है
।

Saturday, 8 August 2020

Hindi story-बुरी शिक्षा का बुरा फल

 बुरी शिक्षा का बुरा फल

  किसी नगर में दानी नामक व्यापारी रहता था। उसका काम नाम के एकदम विपरीत था, अर्थात ना तो वह स्वयं दान देता था और ना ही अपने परिवारजनों को दान करने देता था। जब भी कोई साधु उस की दहलीज पर खड़ा हो भीख मांगता तो वह कह कह देता आगे बढ़ो और वह इतना-सा वाक्य कह टाल देता था।

दानी, दानी या धर्मी तो था ही नहीं। हां वह अधर्म अवश्य करता था। उसके किराने की दुकान थी। वह जो भी सामग्री बेचता, उसमें मिलावट करके ही बेचता था। मिलावट का कार्य एक अकेले करें,ऐसी बात नहीं थी अपितु वह अपने परिवार वालों को भी मिलावट करके सामग्री बेचने के लिए प्रोत्साहित करता। लोग अशुद्ध सामग्री खरीद कर ले जाते और अक्सर बीमार रहते थे। दानी के पुत्र का नाम धनेश था। वह अक्सर पूछ बैठाता-" पिताजी, आप मिलावट क्यों करते हो?" इस पर दानी कह देता- "बेटा, शुद्ध सामग्री हानिकारक होती है। इसलिए मिलावट करके बेचता हूं। " उसने धनेश को भी मिलावट का कार्य सिखा दिया था। मगर धनेश अक्सर देखता था कि दानी जो भी सामग्री घर के लिए निकालता है, उसमें मिलावट नहीं रहती। धनेश सोचता कि इससे तो हम बीमार पड़ जाएंगे। वह मिलावट कर देता था। इसकी जानकारी ना ही दानी को हो पाती थी। क्यों की दानी ने धनेश को समझाया था की जब  मिलावट करते हैं तो इसकी चर्चा अन्यत्र नहीं करनी चाहिए। इसलिए धनेश मिलावट तो कर दिया करता लेकिन बताता किसी को नहीं था। 

 

यद्यपि घर के लिए दानिश शुद्ध सामग्री निकालता मगर मिलावट सामग्री खाता। उसे इसका अनुभव अवश्य होता कि खाद्य सामग्रियों में मिलावट हुई है। मगर पूछ नहीं पाता था क्योंकि उसे विश्वास नहीं था कि उसके खाने की वस्तु में भी मिलावट की गई है। इसी कारण एक दिन दानी इतना बीमार पड़ गया कि खाट से उठना तक मुश्किल हो गया। अब वह खाट में ही पड़े भोजन करता, दूध पीता। अक्सर दूध देने की जिम्मेदारी धनेश पर आ जाती। वह देखता जो दूध मां ने पिता के लिए दिया है वह शुद्ध है अर्थात उसमें मिलावट नहीं की गई है। वह सोचता कि यदि पिताजी को शुद्ध दूध दे दिया तो वे और अधिक बीमार हो जाएंगे। इस विचार के साथ वह आधा दूध स्वयं पी जाता और आधे दूध में पानी मिलाकर दानी को दे देता। 

 


दानी दूध पीता तो अनुभव अवश्य होता कि इसमें पानी अधिक मात्रा में मिला है, मगर तत्काल इससे असमहत भी हो जाता क्योंकि दूध घर का होता था। तब पानी मिलाने का प्रश्न ही नहीं उठता था। मगर उसे संदेह हो गया। एक दिन उसके दूध पीने का समय हुआ तो उसने खिड़की से पुत्र का काम देखा तो दंग रह गया। पुत्र आधा दूध तो पी गया और आधे में पानी मिलाकर पिता के पास आया। उसने दानी को थमा दीया। दानी ने कहा-" बेटा धनेश क्या घर में और दूध नहीं है?"" क्यों नहीं, पूरे पांच लीटर दूध और रखा है।" धनेश का उत्तर था। फिर तुमने उस में से दूध पीने के बदले मेरा दूध पीकर उसमें पानी क्यों मिलाया?" आप ही तो कहते हैं ना, शुद्ध सामग्री हानिकारक होता है। मगर मम्मी आपके दूध में पानी नहीं मिलती थी। मैंने सोचा आपको शुद्ध दूध देने से आपकी बीमारी और बढ़ेगी। बीमारी ना बढ़े, यही सोच कर तो मैंने मिलावट करने करके देना उचित समझा। 

  बुरी शिक्षा का परिणाम दानी ने देख लिया था। तब से उसने ना ही मिलावट करने की शिक्षा दी, अपितु मिलावट से होने वाली हानियां भी गिनाने लगा। इतना ही नहीं, वह अब जो भी दहलीज पर आता उसे भोजन अवश्य देता, वह भी शुद्ध। 

Hindi story-बुद्धिमान व्यापारी

 बुद्धिमान व्यापारी

   बहुत दिन हुए उत्तर भारत के एक गांव में एक गरीब मजदूर रहता था। वह गांव पहाड़ों और जंगलों के किनारे बसा हुआ था। इसलिए अक्सर जंगलों में रहने वाले डाकू रात के समय इस गांव पर धावा बोल दिया करते थे। डाकुओं को गांव वालों के पास जो कुछ मिलता, उसे वे छीन कर ले जाते थे। 

 

एक बार एक व्यापारी इस गांव में आया। क्योंकि रात हो चुकी थी, इसलिए उसने मजदूर के घर के दरवाजे पर दस्तक दी। मजदूर ने दरवाजा खोला। व्यापारी ने मजदूर से कहा- मैं शहर जाने के लिए आया था। लेकिन यहीं पर रात हो गई।क्या तुम मुझे अपने घर में रात गुजरने को जगह दे सकते हो। 

मजदूर बहुत भला आदमी था, उसने घर आए अजनबी मेहमान का स्वागत करते हुए कहा-" क्यों नहीं? आइए, यह तो आपका ही घर है। आप यहां रात गुजार सकते हैं। 

मजदूर ने अपने घर रुखा-सुखा खाना बड़े प्रेम और आदर से व्यापारी को खिलाया। फिर उसके सोने का प्रबंध कर दिया।

   आधी रात के करीब कुछ शोर सुनकर व्यापारी की आंखें खुल गई। उसने देखा कि घर का मालिक वह मजदूर अपने हाथों में एक पोटली लिए इधर-उधर बड़ी बेचैनी से चक्कर काट रहा है। 

   व्यापारी यह माजरा समझ नहीं पाया और उसने उत्सुकता से मजदूर से पूछा-" क्यों क्या बात है?"

 

"साहब डाकुओं ने धावा बोल दिया है। मैंने बेहद मेहनत से पांच सौ रुपये अपनी बेटी की शादी के लिए बचाए थे। मुझे डर है कि यह रुपए डाकू ले जाएंगे। आप ही बताइए कि मुझे क्या करना चाहिए?" मजदूर ने व्यापारी से कहा। 

  व्यापारी ने फौरन सलाह दी" अरे इसमें इतना परेशान क्यों हो रहे हो। जल्दी से सामने गड्ढा खोदकर अपने धन की पोटली उसमें छुपा दो।"

  मजदूर ने व्यापारी का सुझाव माना और झटपट गड्ढा खोदकर उसमें धन की पोटली छुपा दी।

  थोड़े ही देर में पांच-सात डाकुओं का एक दल मजदूर के मकान में घुस आया। उसके सरदार ने कड़कती हुई आवाज में पूछा-" अपना सारा धन हमारे हवाले कर दो।"

  मजदूर गिड़गिड़ा कर अपनी गरीबी बताने लगा तो सरदार ने अपने आदमियों को हुक्म दिया कि वे लोग मजदूर के घर की तलाशी ले। डाकू घर की तलाशी लेना शुरू करते, इससे पहले ही व्यापारी बोल पड़ा-" आप लोग तलाशी ना ले।  मैं बताता हूं इसने अपना धन कहां छुपाया है? 

  फिर व्यापारी ने सामने इशारा करते हुए कहा-" आप लोग यहां खोदे। आनन-फानन में डाकुओं ने वह जगह खोद डाली।कुछ समय में धन की पोटली उनके हाथ लग गई। उन्होंने धन की पोटली ले ली और मजदूर को गालियां देते हुए चले गए। 

  इधर यह सब देखकर मजदूर ने सोचा कि हो ना हो यह व्यापारी भी डाकुओ का आदमी है, तभी तो इसने खुद मुझे धन गड्ढे में छुपाने की सलाह दी और फिर उसी ने डाकुओं को धन का पता बता दिया। 

  मजदूर ने जब यह देखा कि वह व्यापारी डाकू के साथ नहीं गया है तो उसे आश्चर्य हुआ। 

  डाकुओं के जाने के बाद मजदूर ने दरवाजा बंद कर लिया और व्यापारी के पास पहुंच कर गुस्से में बड़ी देर तक उसे बुरा- भला कहता रहा। व्यापारी सब कुछ सुन कर मुस्कुराता रहा। जब मजदूर का जी भर गया और वह खुद चुप हो गया। तब सहज स्वर में व्यापारी ने कहना शुरू कर किया "भाई, अब मेरी बात सुनो। दरअसल मैंने डाकुओं को तुम्हारे धन का पता बता कर तुम्हारे साथ अपने को भी भारी नुकसान से बचाया। जानते हो अगर डाकू तुम्हारे घर की घर की तलाशी लेते तो उनके हाथ मेरी वह पोटली लग जाती ,जिसमें ढाई हजार रुपए नगद और सोने के कुछ जेवर हैं। मैंने डाकुओं को तुम्हारी पोटली का पता बताकर उनका ध्यान उस ओर कर दिया और उन्होंने घर की तलाशी नहीं ली।

  यह कह कर व्यापारी ने अपनी पोटली में से छः सौ रुपये निकालकर मजदूर को देते हुए कहा- यह लो लो तुम्हारे पांच सौ रुपये और एक सौ तुम्हारी बिटिया को उसकी शादी पर मेरी ओर से। 

 मजदूर व्यापारी की सूझबूझ और बुद्धिमानी देखकर दंग रह गया। 

Hindi story-भाग्य का खेल (शंका,संदेह)

  भाग्य का खेल       बहुत वर्षों पहले इसकी सिसली में राजा लिओन्टेस राज्य करता था। इटली के पास सिसली एक बड़ा टापू है। राजा लिओन्टेस के राज्य ...