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Saturday, 8 August 2020

Hindi story-बुरी शिक्षा का बुरा फल

 बुरी शिक्षा का बुरा फल

  किसी नगर में दानी नामक व्यापारी रहता था। उसका काम नाम के एकदम विपरीत था, अर्थात ना तो वह स्वयं दान देता था और ना ही अपने परिवारजनों को दान करने देता था। जब भी कोई साधु उस की दहलीज पर खड़ा हो भीख मांगता तो वह कह कह देता आगे बढ़ो और वह इतना-सा वाक्य कह टाल देता था।

दानी, दानी या धर्मी तो था ही नहीं। हां वह अधर्म अवश्य करता था। उसके किराने की दुकान थी। वह जो भी सामग्री बेचता, उसमें मिलावट करके ही बेचता था। मिलावट का कार्य एक अकेले करें,ऐसी बात नहीं थी अपितु वह अपने परिवार वालों को भी मिलावट करके सामग्री बेचने के लिए प्रोत्साहित करता। लोग अशुद्ध सामग्री खरीद कर ले जाते और अक्सर बीमार रहते थे। दानी के पुत्र का नाम धनेश था। वह अक्सर पूछ बैठाता-" पिताजी, आप मिलावट क्यों करते हो?" इस पर दानी कह देता- "बेटा, शुद्ध सामग्री हानिकारक होती है। इसलिए मिलावट करके बेचता हूं। " उसने धनेश को भी मिलावट का कार्य सिखा दिया था। मगर धनेश अक्सर देखता था कि दानी जो भी सामग्री घर के लिए निकालता है, उसमें मिलावट नहीं रहती। धनेश सोचता कि इससे तो हम बीमार पड़ जाएंगे। वह मिलावट कर देता था। इसकी जानकारी ना ही दानी को हो पाती थी। क्यों की दानी ने धनेश को समझाया था की जब  मिलावट करते हैं तो इसकी चर्चा अन्यत्र नहीं करनी चाहिए। इसलिए धनेश मिलावट तो कर दिया करता लेकिन बताता किसी को नहीं था। 

 

यद्यपि घर के लिए दानिश शुद्ध सामग्री निकालता मगर मिलावट सामग्री खाता। उसे इसका अनुभव अवश्य होता कि खाद्य सामग्रियों में मिलावट हुई है। मगर पूछ नहीं पाता था क्योंकि उसे विश्वास नहीं था कि उसके खाने की वस्तु में भी मिलावट की गई है। इसी कारण एक दिन दानी इतना बीमार पड़ गया कि खाट से उठना तक मुश्किल हो गया। अब वह खाट में ही पड़े भोजन करता, दूध पीता। अक्सर दूध देने की जिम्मेदारी धनेश पर आ जाती। वह देखता जो दूध मां ने पिता के लिए दिया है वह शुद्ध है अर्थात उसमें मिलावट नहीं की गई है। वह सोचता कि यदि पिताजी को शुद्ध दूध दे दिया तो वे और अधिक बीमार हो जाएंगे। इस विचार के साथ वह आधा दूध स्वयं पी जाता और आधे दूध में पानी मिलाकर दानी को दे देता। 

 


दानी दूध पीता तो अनुभव अवश्य होता कि इसमें पानी अधिक मात्रा में मिला है, मगर तत्काल इससे असमहत भी हो जाता क्योंकि दूध घर का होता था। तब पानी मिलाने का प्रश्न ही नहीं उठता था। मगर उसे संदेह हो गया। एक दिन उसके दूध पीने का समय हुआ तो उसने खिड़की से पुत्र का काम देखा तो दंग रह गया। पुत्र आधा दूध तो पी गया और आधे में पानी मिलाकर पिता के पास आया। उसने दानी को थमा दीया। दानी ने कहा-" बेटा धनेश क्या घर में और दूध नहीं है?"" क्यों नहीं, पूरे पांच लीटर दूध और रखा है।" धनेश का उत्तर था। फिर तुमने उस में से दूध पीने के बदले मेरा दूध पीकर उसमें पानी क्यों मिलाया?" आप ही तो कहते हैं ना, शुद्ध सामग्री हानिकारक होता है। मगर मम्मी आपके दूध में पानी नहीं मिलती थी। मैंने सोचा आपको शुद्ध दूध देने से आपकी बीमारी और बढ़ेगी। बीमारी ना बढ़े, यही सोच कर तो मैंने मिलावट करने करके देना उचित समझा। 

  बुरी शिक्षा का परिणाम दानी ने देख लिया था। तब से उसने ना ही मिलावट करने की शिक्षा दी, अपितु मिलावट से होने वाली हानियां भी गिनाने लगा। इतना ही नहीं, वह अब जो भी दहलीज पर आता उसे भोजन अवश्य देता, वह भी शुद्ध। 

Hindi story-बुद्धिमान व्यापारी

 बुद्धिमान व्यापारी

   बहुत दिन हुए उत्तर भारत के एक गांव में एक गरीब मजदूर रहता था। वह गांव पहाड़ों और जंगलों के किनारे बसा हुआ था। इसलिए अक्सर जंगलों में रहने वाले डाकू रात के समय इस गांव पर धावा बोल दिया करते थे। डाकुओं को गांव वालों के पास जो कुछ मिलता, उसे वे छीन कर ले जाते थे। 

 

एक बार एक व्यापारी इस गांव में आया। क्योंकि रात हो चुकी थी, इसलिए उसने मजदूर के घर के दरवाजे पर दस्तक दी। मजदूर ने दरवाजा खोला। व्यापारी ने मजदूर से कहा- मैं शहर जाने के लिए आया था। लेकिन यहीं पर रात हो गई।क्या तुम मुझे अपने घर में रात गुजरने को जगह दे सकते हो। 

मजदूर बहुत भला आदमी था, उसने घर आए अजनबी मेहमान का स्वागत करते हुए कहा-" क्यों नहीं? आइए, यह तो आपका ही घर है। आप यहां रात गुजार सकते हैं। 

मजदूर ने अपने घर रुखा-सुखा खाना बड़े प्रेम और आदर से व्यापारी को खिलाया। फिर उसके सोने का प्रबंध कर दिया।

   आधी रात के करीब कुछ शोर सुनकर व्यापारी की आंखें खुल गई। उसने देखा कि घर का मालिक वह मजदूर अपने हाथों में एक पोटली लिए इधर-उधर बड़ी बेचैनी से चक्कर काट रहा है। 

   व्यापारी यह माजरा समझ नहीं पाया और उसने उत्सुकता से मजदूर से पूछा-" क्यों क्या बात है?"

 

"साहब डाकुओं ने धावा बोल दिया है। मैंने बेहद मेहनत से पांच सौ रुपये अपनी बेटी की शादी के लिए बचाए थे। मुझे डर है कि यह रुपए डाकू ले जाएंगे। आप ही बताइए कि मुझे क्या करना चाहिए?" मजदूर ने व्यापारी से कहा। 

  व्यापारी ने फौरन सलाह दी" अरे इसमें इतना परेशान क्यों हो रहे हो। जल्दी से सामने गड्ढा खोदकर अपने धन की पोटली उसमें छुपा दो।"

  मजदूर ने व्यापारी का सुझाव माना और झटपट गड्ढा खोदकर उसमें धन की पोटली छुपा दी।

  थोड़े ही देर में पांच-सात डाकुओं का एक दल मजदूर के मकान में घुस आया। उसके सरदार ने कड़कती हुई आवाज में पूछा-" अपना सारा धन हमारे हवाले कर दो।"

  मजदूर गिड़गिड़ा कर अपनी गरीबी बताने लगा तो सरदार ने अपने आदमियों को हुक्म दिया कि वे लोग मजदूर के घर की तलाशी ले। डाकू घर की तलाशी लेना शुरू करते, इससे पहले ही व्यापारी बोल पड़ा-" आप लोग तलाशी ना ले।  मैं बताता हूं इसने अपना धन कहां छुपाया है? 

  फिर व्यापारी ने सामने इशारा करते हुए कहा-" आप लोग यहां खोदे। आनन-फानन में डाकुओं ने वह जगह खोद डाली।कुछ समय में धन की पोटली उनके हाथ लग गई। उन्होंने धन की पोटली ले ली और मजदूर को गालियां देते हुए चले गए। 

  इधर यह सब देखकर मजदूर ने सोचा कि हो ना हो यह व्यापारी भी डाकुओ का आदमी है, तभी तो इसने खुद मुझे धन गड्ढे में छुपाने की सलाह दी और फिर उसी ने डाकुओं को धन का पता बता दिया। 

  मजदूर ने जब यह देखा कि वह व्यापारी डाकू के साथ नहीं गया है तो उसे आश्चर्य हुआ। 

  डाकुओं के जाने के बाद मजदूर ने दरवाजा बंद कर लिया और व्यापारी के पास पहुंच कर गुस्से में बड़ी देर तक उसे बुरा- भला कहता रहा। व्यापारी सब कुछ सुन कर मुस्कुराता रहा। जब मजदूर का जी भर गया और वह खुद चुप हो गया। तब सहज स्वर में व्यापारी ने कहना शुरू कर किया "भाई, अब मेरी बात सुनो। दरअसल मैंने डाकुओं को तुम्हारे धन का पता बता कर तुम्हारे साथ अपने को भी भारी नुकसान से बचाया। जानते हो अगर डाकू तुम्हारे घर की घर की तलाशी लेते तो उनके हाथ मेरी वह पोटली लग जाती ,जिसमें ढाई हजार रुपए नगद और सोने के कुछ जेवर हैं। मैंने डाकुओं को तुम्हारी पोटली का पता बताकर उनका ध्यान उस ओर कर दिया और उन्होंने घर की तलाशी नहीं ली।

  यह कह कर व्यापारी ने अपनी पोटली में से छः सौ रुपये निकालकर मजदूर को देते हुए कहा- यह लो लो तुम्हारे पांच सौ रुपये और एक सौ तुम्हारी बिटिया को उसकी शादी पर मेरी ओर से। 

 मजदूर व्यापारी की सूझबूझ और बुद्धिमानी देखकर दंग रह गया। 

Hindi story-भाग्य का खेल (शंका,संदेह)

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